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जिंदगी में कब, कहाँ क्या हो जाए कुछ कह नहीं सकते। अब रविवार की सुबह मेरी नींद खुली और मैं बाहर जैसे ही गया कि सामने सेआवाज़ आती है चलो विजयगढ़ चलना है जबतक मै कुछ समझ पता तबतक एक जन और आकर बोलते है तैयार होने की ज़रूरत नहीं हैऐसे ही चलो बस में सारा व्यवस्था है।इतना सुनने के बाद हमें क्या सोचना था मैंने हमी भर दी। सबलोग बस में बैठे जिनमें हमसब 20 लोग थे और बस विजयगढ़ के लिए चल दी हँसते, गाते, चिल्लाते हमलोग तक़रीबन दोपहर के 1 या 2 बजे विजयगढ़ पहुँचे।हल्की हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी सभी लोग बस से उतरकर पहाड़ की चोटी पर बने क़िले के पास जाने लगे चढ़ते चढ़ते बारिश रुक चुकी थी।हम सभी लोग ऊपर पहुँचकर नीचे जंगल की तरफ़ देखे फिर नज़रें अपनेआप चारों तरफ़ घूमने लगीं फिर वहाँ से वादियों को देखा औरइनकी ख़ूबसूरती को शायद मै अपने शब्दों बयाँ ना कर पाऊँ। उस अद्भूत ख़ूबसूरती को निहारने के बाद हम सारे लोग क़िले का पूरा चक्कर लगाए जिसके बाद हम नीचे उतरे और बाटी-चोखा खाने का प्रबंध करने लगे और जबतक बाटी चोखा बना शाम काफ़ी हो चुकीथी। शाम के क़रीब सात बजे हमलोग वहाँ से घर की तरफ़ चल दिए और शाम को जाने के लिए वहाँ से एक ही रास्ता था वो भी ख़तरनाक 2 किलोमीटर आगे जाने पर सड़क के बीच में एक ट्रक धंसी थी जिससे बस का निकल पाना संभव नही था हमने पूरी कोशिश की परकुछ नहीं हो पाया। वहीं कुछ लोगों से पूछने पर पता चला यही जंगल से होते हुए बहुत घूमकर एक रास्ता है जिससे हमलोग बाहरनिकल सकते हैं।अब रात के क़रीब आठ बज रहे थे हमलोग गाड़ी मोड़कर फिर उसी ख़तरनाक रास्ते से होते हुए जंगल की तरफ़ चल पड़ेअब कुछ बड़े लोगों के चहरे पर डर और चिंता साफ़ देखा जा सकता था पर हमसब एकदम मस्त सबका तो पता नहीं पर मैंने जिंदगी में पहली बार ऐसा एहसास किया था जिसमें ख़ुशी, रोमांच और डर सब था। एक दो लोगों से पूछते हमलोग कुछ दूर आगे तक गये रात केक़रीब नौ बज रहे होंगे हमारी बस एक जंगल में ही बने एक झोंपड़े जैसे घर के पास आकर रुकी बस से उतर कर एक लोग वहाँ के लोगोंसे रास्ता पूछने गये और फिर काफ़ी बात चित के बाद ये निर्णय हो सका की आगे रास्ता बहुत ख़राब है हम रात में नहीं जा सकते।अबसब लोग यही सोच रहे थे कहाँ हम 6 बजे तक अपने घर पर होते पर बाटी-चोखा के चक्कर में हम इस डरावने जंगल में रात गुज़ारने कोमजबूर हैं।पर हमारी टोली एकदम मस्त थी सब बोले लोजी हो गया एकदम फूल एडवेंचर। उस घर का एक लड़का हमें पास के एक छोटेसे गाँव में लेकर गया जहां हम अपनी गाड़ी सुरक्षित खड़ी करके कुछ खाने का प्रबंध कर सके और ऐसा ही हुआ ऊपर वाले की कृपा सेहमने कुछ खा पीकर बस में ही हँसते, गाते, सोते रात गुज़ार ली और फिर सुबह पहाड़ जंगल घूमते ख़तरनाक रास्ते से हम जंगल से बाहरनिकल आए। बाहर आने के बाद फिर से चोपन के क़रीब एक झरने के पास नहाने और खाने की तैयारी हो गयी। ऐसे ही मस्ती करते हमसब क़रीब 3 बजे अपने घर को सुरक्षित आ गये और जिंदगी में कभी ना भूलने वाली यादें अपने अपने मोबाइल में लेकर आए। ~ सौरभ...
जिंदगी में कब, कहाँ क्या हो जाए कुछ कह नहीं सकते। अब रविवार की सुबह मेरी नींद खुली और मैं बाहर जैसे ही गया कि सामने सेआवाज़ आती है चलो विजयगढ़ चलना है जबतक मै कुछ समझ पता तबतक एक जन और आकर बोलते है तैयार होने की ज़रूरत नहीं हैऐसे ही चलो बस में सारा व्यवस्था है।इतना सुनने के बाद हमें क्या सोचना था मैंने हमी भर दी। सबलोग बस में बैठे जिनमें हमसब 20 लोग थे और बस विजयगढ़ के लिए चल दी हँसते, गाते, चिल्लाते हमलोग तक़रीबन दोपहर के 1 या 2 बजे विजयगढ़ पहुँचे।हल्की हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी सभी लोग बस से उतरकर पहाड़ की चोटी पर बने क़िले के पास जाने लगे चढ़ते चढ़ते बारिश रुक चुकी थी।हम सभी लोग ऊपर पहुँचकर नीचे जंगल की तरफ़ देखे फिर नज़रें अपनेआप चारों तरफ़ घूमने लगीं फिर वहाँ से वादियों को देखा औरइनकी ख़ूबसूरती को शायद मै अपने शब्दों बयाँ ना कर पाऊँ। उस अद्भूत ख़ूबसूरती को निहारने के बाद हम सारे लोग क़िले का पूरा चक्कर लगाए जिसके बाद हम नीचे उतरे और बाटी-चोखा खाने का प्रबंध करने लगे और जबतक बाटी चोखा बना शाम काफ़ी हो चुकीथी। शाम के क़रीब सात बजे हमलोग वहाँ से घर की तरफ़ चल दिए और शाम को जाने के लिए वहाँ से एक ही रास्ता था वो भी ख़तरनाक 2 किलोमीटर आगे जाने पर सड़क के बीच में एक ट्रक धंसी थी जिससे बस का निकल पाना संभव नही था हमने पूरी कोशिश की परकुछ नहीं हो पाया। वहीं कुछ लोगों से पूछने पर पता चला यही जंगल से होते हुए बहुत घूमकर एक रास्ता है जिससे हमलोग बाहरनिकल सकते हैं।अब रात के क़रीब आठ बज रहे थे हमलोग गाड़ी मोड़कर फिर उसी ख़तरनाक रास्ते से होते हुए जंगल की तरफ़ चल पड़ेअब कुछ बड़े लोगों के चहरे पर डर और चिंता साफ़ देखा जा सकता था पर हमसब एकदम मस्त सबका तो पता नहीं पर मैंने जिंदगी में पहली बार ऐसा एहसास किया था जिसमें ख़ुशी, रोमांच और डर सब था। एक दो लोगों से पूछते हमलोग कुछ दूर आगे तक गये रात केक़रीब नौ बज रहे होंगे हमारी बस एक जंगल में ही बने एक झोंपड़े जैसे घर के पास आकर रुकी बस से उतर कर एक लोग वहाँ के लोगोंसे रास्ता पूछने गये और फिर काफ़ी बात चित के बाद ये निर्णय हो सका की आगे रास्ता बहुत ख़राब है हम रात में नहीं जा सकते।अबसब लोग यही सोच रहे थे कहाँ हम 6 बजे तक अपने घर पर होते पर बाटी-चोखा के चक्कर में हम इस डरावने जंगल में रात गुज़ारने कोमजबूर हैं।पर हमारी टोली एकदम मस्त थी सब बोले लोजी हो गया एकदम फूल एडवेंचर। उस घर का एक लड़का हमें पास के एक छोटेसे गाँव में लेकर गया जहां हम अपनी गाड़ी सुरक्षित खड़ी करके कुछ खाने का प्रबंध कर सके और ऐसा ही हुआ ऊपर वाले की कृपा सेहमने कुछ खा पीकर बस में ही हँसते, गाते, सोते रात गुज़ार ली और फिर सुबह पहाड़ जंगल घूमते ख़तरनाक रास्ते से हम जंगल से बाहरनिकल आए। बाहर आने के बाद फिर से चोपन के क़रीब एक झरने के पास नहाने और खाने की तैयारी हो गयी। ऐसे ही मस्ती करते हमसब क़रीब 3 बजे अपने घर को सुरक्षित आ गये और जिंदगी में कभी ना भूलने वाली यादें अपने अपने मोबाइल में लेकर आए। ~ सौरभ...
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